अध्याय 3 : आधी रात का पहला सच
"कुछ कहानियाँ अंधेरे में शुरू होती हैं... और कुछ सच सिर्फ़ आधी रात के बाद ही सामने आते हैं।"
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| "कुछ सच अंधेरे में छिपे होते हैं... और कुछ सिर्फ़ आधी रात के बाद सामने आते हैं।" |
स रात नींद मेरी आँखों से कोसों दूर थी।
बार-बार मेरी आँखों के सामने वही चेहरा आ रहा था।
उलझे हुए बाल...
फटे हुए कपड़े...
सूजी हुई आँखें...
और वह सवाल...
"क्या तुम भी बाकी लोगों जैसे हो?"
मैंने करवट बदली।
झोपड़ी की खिड़की से बाहर देखा।
पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा हुआ था।
दूर पहाड़ों से आती ठंडी हवा मिट्टी की खुशबू अपने साथ ला रही थी।
लेकिन न जाने क्यों...
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मुझे देख रहा हो।
मैंने तुरंत उठकर बाहर कदम रखा।
चारों तरफ़ सन्नाटा था।
इतना सन्नाटा कि अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
तभी...
झाड़ियों के पीछे कुछ हिला।
मैं एक पल के लिए ठिठक गया।
"कौन है वहाँ?"
कोई जवाब नहीं आया।
फिर वही सरसराहट।
मैं धीरे-धीरे उस तरफ़ बढ़ा।
जैसे ही झाड़ी हटाई...
एक बंदर छलांग लगाकर सामने आया।
मैं घबरा गया।
लेकिन वह भागा नहीं।
बस मुझे देखता रहा।
उसकी आँखों में डर नहीं था...
बेचैनी थी।
वह कुछ कदम आगे बढ़ा...
फिर पीछे मुड़कर मुझे देखने लगा।
मानो कह रहा हो—
"मेरे पीछे आओ..."
मुझे नहीं पता क्यों...
लेकिन मेरे कदम उसके पीछे चल पड़े।
गाँव की आख़िरी गली पार करते ही रास्ता जंगल की ओर मुड़ गया।
चाँद बादलों में छिप रहा था।
चारों तरफ़ सिर्फ़ पेड़ों की परछाइयाँ थीं।
बंदर बार-बार रुकता...
मुझे देखता...
फिर आगे बढ़ जाता।
लगभग दस मिनट चलने के बाद वह एक पुराने बरगद के पेड़ के पास रुक गया।
पेड़ के नीचे मिट्टी का एक छोटा-सा चबूतरा था।
उस पर एक बुझा हुआ दिया रखा था।
और उसके पास...
एक छोटी-सी पोटली।
मैंने पोटली खोली।
उसमें दो सूखी रोटियाँ...
थोड़ा-सा गुड़...
और एक मिट्टी की छोटी बोतल में दूध था।
मैं हैरान रह गया।
इतनी रात को...
यह खाना यहाँ कौन रख गया?
तभी पीछे से किसी ने कहा—
"उसे मत छूना बेटा..."
मैंने पलटकर देखा।
वही बूढ़ी अम्मा...
जिसने दिन में मुझे गाँव का रास्ता बताया था।
हाथ में लालटेन...
चेहरे पर चिंता...
और आँखों में बरसों का दर्द।
"आप...?"
अम्मा धीरे-धीरे मेरे पास आईं।
उन्होंने पोटली उठाई...
और बंदर की तरफ़ बढ़ा दी।
बंदर ने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया।
मैंने पूछा—
"यह किसके लिए है?"
अम्मा की आँखें भर आईं।
"उसके लिए..."
"किसके?"
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| जिसे पूरा गाँव भूल गया... उसे कोई आज भी चुपचाप खाना पहुँचा रहा था। |
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
"युसुवी के लिए।"
मेरे पूरे शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
"लेकिन..."
"गाँव वाले तो उसे खाना भी नहीं देते..."
अम्मा मुस्कुराईं।
"इसलिए तो पिछले बारह साल से..."
"मैं और यह बंदर..."
"उसे ज़िंदा रखे हुए हैं।"
मैं कुछ पल तक उन्हें देखता रह गया।
बारह साल...
मतलब...
कोई तो था...
जिसे युसुवी से डर नहीं लगता था।
मैंने हिम्मत करके पूछा—
"अम्मा..."
"क्या युसुवी सच में..."
अम्मा ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही रोक दी।
"अगर वह डायन होती..."
"तो सबसे पहले मुझे मारती।"
उन्होंने अपने काँपते हाथ मेरी ओर बढ़ाए।
"लेकिन उसने आज तक मेरे शरीर पर एक खरोंच तक नहीं मारी।"
मैं चुप हो गया।
तो फिर...
पूरा गाँव झूठ क्यों बोल रहा था?
अम्मा ने बरगद की ओर देखते हुए कहा—
"तुमने आज सिर्फ़ उसका पिंजरा देखा है..."
"मैंने उसका बचपन देखा है।"
"वह जब पाँच साल की थी..."
"तो घायल चिड़ियों को घर लाकर उनका इलाज करती थी।"
"भूखे कुत्तों को अपनी रोटी खिला देती थी।"
"जिस बच्ची को फूल तोड़ने पर भी रोना आ जाता था..."
"वह किसी इंसान को कैसे मार सकती है?"
मेरे भीतर सवालों का तूफ़ान उठ चुका था।
अगर युसुवी निर्दोष थी...
तो उसे पिंजरे में किसने डाला?
मैंने पूछा—
"उसके माँ-बाप कहाँ हैं?"
अम्मा अचानक चुप हो गईं।
उनके हाथ काँपने लगे।
कुछ देर बाद उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"उन्हें..."
"गाँव ने..."
"युसुवी से पहले ही मार दिया था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"क्या...?"
"क्यों?"
अम्मा की आँखों से आँसू बह निकले।
"क्योंकि..."
"वे अपनी बेटी को डायन मानने को तैयार नहीं थे।"
इतने में...
दूर पहाड़ी की तरफ़ से घंटी की आवाज़ आई।
टन...
टन...
टन...
अम्मा का चेहरा अचानक सफ़ेद पड़ गया।
"हे भगवान..."
"वह आ गया..."
"कौन?"
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| कुछ साए सिर्फ़ अंधेरे में नहीं छिपते... वे सच के भी रखवाले होते हैं। |
अम्मा ने मेरी कलाई कसकर पकड़ ली।
"अगर ज़िंदा रहना चाहते हो..."
"तो आज की रात किसी से मत कहना कि तुम मुझसे मिले थे।"
"और कभी..."
"कभी भी..."
"पुराने मंदिर की तरफ़ मत जाना..."
उन्होंने इतना कहा...
और अँधेरे में गायब हो गईं।
मैं अकेला खड़ा था।
हाथ में लालटेन...
दिल में सौ सवाल...
और दूर पहाड़ी पर...
एक साया...
जो हमें देख रहा था।
उसके हाथ में लंबा डंडा था...
और उसकी आँखें...
सीधे मेरी आँखों में थीं।
अम्मा जा चुकी थीं।
चारों तरफ़ फिर वही सन्नाटा था।
मैंने आख़िरी बार उस पुराने बरगद की तरफ़ देखा।
तभी...
पेड़ के पीछे से एक छोटी-सी बच्ची बाहर आई।
सफेद कपड़े...
नंगे पैर...
चेहरे पर हल्की मुस्कान...
मैंने सोचा...
शायद गाँव की कोई बच्ची होगी।
मैंने पूछा—
"बेटा... इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?"
उसने मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देखा।
और सिर्फ़ एक ही बात कही—
"युसुवी को बचा लो..."
इतना कहकर...
वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी...
और...
मेरी आँखों के सामने...
हवा में गायब हो गई।
मैं पत्थर की तरह वहीं खड़ा रह गया।
क्योंकि...
जिस दिशा में वह गई थी...
वहाँ...
कोई रास्ता ही नहीं था।
जारी रहेगा...
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