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जिसे गाँव डायन समझता था | युसुवी अध्याय 1

युसुवी


अध्याय 1 : पिंजरे में बंद परी

"ये कहानी है उस लड़की की जिसे बनना था शायद दुनिया की राजकुमारी, लेकिन बन गई सबकी नज़र में पागल।

ये कहानी है उस लड़की की जो थी एक परी, लेकिन लोगों को लगती थी बुरा साया।

ये कहानी है उस लड़की की जिसे उसके माँ-बाप ने पलकों पर बिठाकर पाला था, लेकिन आज वह एक लोहे के पिंजरे में बंद थी।

ये कहानी है... युसुवी की।"


शहर की ज़िंदगी कभी-कभी इंसान को इतना थका देती है कि उसे खुद से मिलने के लिए भी कहीं दूर जाना पड़ता है।

मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था।

सुबह उठना, काम करना, लोगों से मिलना, मोबाइल की घंटियाँ सुनना, रात को थककर सो जाना। जिंदगी जैसे किसी मशीन की तरह चल रही थी। दिन बदल रहे थे, लेकिन जीवन नहीं।

इसीलिए जब भी मन बहुत बेचैन हो जाता, मैं पहाड़ों की तरफ निकल जाता था।

मुझे पहाड़ हमेशा से पसंद थे।

उनकी खामोशी।

उनकी ठंडी हवा।

और सबसे ज्यादा, वहाँ का सुकून।

उस दिन भी मैं बिना किसी तय मंज़िल के निकल पड़ा था। घंटों सफर करने के बाद मेरी गाड़ी एक छोटे से पहाड़ी रास्ते पर पहुँची। सड़क अब खत्म हो चुकी थी। आगे सिर्फ कच्चा रास्ता था।

मैंने गाड़ी एक तरफ खड़ी की और पैदल चलने लगा।

चारों तरफ हरियाली थी।

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ बादलों को छूते हुए दिखाई दे रहे थे।


दूर कहीं एक झरना बह रहा था जिसकी आवाज़ हवा के साथ मिलकर किसी संगीत जैसी लग रही थी।

कुछ देर चलने के बाद मुझे एक छोटा सा गाँव दिखाई दिया।

गाँव वैसा था जैसा मैंने सिर्फ कहानियों में पढ़ा था।

मिट्टी के घर।

लकड़ी की खिड़कियाँ।

छोटे-छोटे खेत।

खेतों में काम करती महिलाएँ।

और घरों के बाहर खेलते बच्चे।

वहाँ आधुनिक दुनिया का कोई निशान नहीं था।

न कोई बड़ी दुकान।

न कोई ट्रैफिक।

न कोई शोर।

जैसे समय कई साल पहले आकर वहीं रुक गया हो।

मैं मुस्कुराया।

शायद मैं इसी शांति की तलाश में यहाँ तक आया था।

लेकिन मुझे नहीं पता था कि इस शांत दिखने वाले गाँव के भीतर एक ऐसा रहस्य छिपा है जो मेरी पूरी जिंदगी बदल देगा।


मैं गाँव की गलियों से गुजर रहा था कि अचानक मुझे कुछ अजीब लगा।

गाँव के लगभग सभी लोग एक ही दिशा में जा रहे थे।

बच्चे भागते हुए जा रहे थे।

औरतें फुसफुसाते हुए जा रही थीं।

बुजुर्ग भी अपने काम छोड़कर उसी तरफ बढ़ रहे थे।

जैसे वहाँ कोई तमाशा लगा हो।

मेरे अंदर भी उत्सुकता जाग गई।

मैं भी भीड़ के पीछे-पीछे चल पड़ा।

जैसे-जैसे मैं करीब पहुँच रहा था, लोगों की आवाज़ें साफ़ सुनाई देने लगीं।

कुछ बच्चे हँस रहे थे।


कुछ चिल्ला रहे थे।

कुछ पत्थर फेंक रहे थे।

मैंने भीड़ के बीच से रास्ता बनाया।

और फिर...

जो मैंने देखा, उसने मेरे कदम रोक दिए।

मेरी साँसें जैसे एक पल के लिए थम गईं।

भीड़ के बीचों-बीच एक बड़ा लोहे का पिंजरा रखा था।

लेकिन उस पिंजरे में कोई जानवर नहीं था।

वहाँ एक लड़की थी।

लगभग बारह साल की।

उसके कपड़े इतने पुराने और फटे हुए थे कि पहचानना मुश्किल था कि उनका असली रंग क्या रहा होगा।

उसके बाल बुरी तरह उलझे हुए थे।

चेहरे और हाथों पर घावों के निशान थे।

पैरों में चप्पल तक नहीं थी।

और उसकी आँखें...

उसकी आँखें देखकर मेरे दिल में जैसे कोई दर्द उतर गया।

वो आँखें ऐसी थीं जिनमें बचपन बहुत पहले मर चुका था।


बच्चे पिंजरे के पास जाकर उसे चिढ़ा रहे थे।

कोई मिट्टी फेंक रहा था।

कोई लकड़ी मार रहा था।

और बाकी बच्चे हँस रहे थे।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है।

लड़की कभी गुस्से से उन्हें देखती, कभी अपने घुटनों में सिर छिपा लेती।

उसकी हालत किसी घायल जानवर जैसी थी जिसे दुनिया ने सिर्फ दर्द दिया हो।

मैं धीरे-धीरे पिंजरे के करीब गया।

उसने पहली बार मेरी तरफ देखा।

हमारी आँखें मिलीं।


और उसी पल मुझे एहसास हुआ कि उसकी आँखों में कुछ अजीब था।

डर।

दर्द।

और मदद की पुकार।

मैंने धीरे से हाथ आगे बढ़ाया।

शायद मैं उसे यह एहसास दिलाना चाहता था कि मैं बाकी लोगों जैसा नहीं हूँ।

लेकिन अचानक वह बिजली की तरह उठी।

उसने पिंजरे की सलाखों को दोनों हाथों से पकड़ लिया और ज़ोर से चीखी।

"हिस्स्स्स्स....!!"

उसकी आवाज़ इतनी डरावनी थी कि मैं खुद पीछे हट गया।

उसी समय किसी ने मुझे जोर से पीछे खींच लिया।

"अरे बाबू! मरना है क्या?"

मैंने मुड़कर देखा।

लगभग चालीस साल का एक आदमी था।

सिर पर मफलर बंधा हुआ।

हाथ में डंडा।

चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

"दूर रहो उससे!" उसने कहा।

"क्यों?" मैंने पूछा।

वह मेरी तरफ ऐसे देखने लगा जैसे मैंने कोई मूर्खता भरा सवाल पूछा हो।

"क्योंकि वो लड़की नहीं है।"

"तो फिर क्या है?"

उसने धीरे से कहा—

"वो डायन है।"


भीड़ में खड़े कई लोगों ने उसकी बात सुनकर सिर हिलाया।

जैसे यह कोई सच्चाई हो जिसे हर कोई जानता हो।

मैंने फिर पिंजरे की तरफ देखा।

वो लड़की अब भी हमें देख रही थी।

लेकिन मुझे उसमें डायन जैसा कुछ नहीं दिखा।

मुझे सिर्फ एक डरी हुई बच्ची दिख रही थी।

"नाम क्या है उसका?" मैंने पूछा।

आदमी कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

"युसुवी।"

पहली बार मैंने यह नाम सुना था।

युसुवी।

नाम सुनने में कितना सुंदर था।

लेकिन जिस तरह लोग उसे देख रहे थे, ऐसा लगता था जैसे उस नाम में कोई श्राप छिपा हो।

"उसे यहाँ क्यों बंद किया है?"

मेरे सवाल पर आदमी का चेहरा बदल गया।

उसकी आँखों में डर उतर आया।

वह धीरे से बोला—

"क्योंकि अगर उसे खुला छोड़ दिया गया... तो पूरा गाँव खत्म हो जाएगा।"

उसकी बात सुनकर मेरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।

लेकिन पता नहीं क्यों...

मुझे उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

मैंने आखिरी बार युसुवी की तरफ देखा।

वह अब भी मुझे देख रही थी।

इस बार उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था।

डर भी नहीं था।

सिर्फ एक सवाल था।

जैसे वह पूछ रही हो—

"क्या तुम भी बाकी लोगों जैसे हो?"

और उसी पल मुझे महसूस हुआ...

इस गाँव में कुछ बहुत बड़ा छिपा हुआ है।

और शायद...

युसुवी वह नहीं है जो लोग उसे बताते हैं।

(अध्याय 1 समाप्त)

अगले अध्याय में...

गाँव वाले युसुवी को डायन क्यों मानते हैं?

उसके माँ-बाप के साथ क्या हुआ?

और आखिर उस छोटी सी बच्ची ने ऐसा क्या किया था कि पूरा गाँव उससे डरने लगा?

जारी रहेगा...


📖 YUSUVI Series


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